अधूरी मोहब्बत की पूरी कहानी (लंबा वर्जन)
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राहुल एक साधारण सा लड़का था। उसकी जिंदगी बहुत सीधी थी—घर से काम और काम से घर। उसे ना तो किसी से ज्यादा उम्मीद थी और ना ही किसी से शिकायत।

लेकिन कहते हैं ना, जब जिंदगी बदलती है तो बिना बताए बदल जाती है…

एक दिन राहुल रोज की तरह ट्रेन से सफर कर रहा था। भीड़ ज्यादा थी, लेकिन उसकी नजर अचानक एक लड़की पर जाकर ठहर गई। वो लड़की खिड़की के पास बैठी थी—सफेद सूट, खुले बाल और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान।

उसका नाम था—प्रिया।

राहुल ने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था। वो बस उसे देखता रह गया। कुछ देर बाद प्रिया ने भी उसकी तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी।

बस… वही पल था, जहां से कहानी शुरू हुई।

थोड़ी देर बाद बात शुरू हुई— “आप रोज इसी ट्रेन से जाते हो?” प्रिया ने पूछा।

राहुल थोड़ा हिचकिचाया, फिर बोला—“हाँ… और आप?”

धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं। उस एक घंटे के सफर में वो दोनों जैसे अपनी अलग ही दुनिया में चले जाते थे।

कुछ दिनों बाद नंबर एक्सचेंज हुए। अब ट्रेन के बाहर भी बात होने लगी—सुबह गुड मॉर्निंग से लेकर रात के गुड नाइट तक।

राहुल को अब हर दिन का इंतजार रहने लगा… सिर्फ प्रिया से मिलने के लिए।

प्रिया भी अब उसकी आदत बन चुकी थी।

दोनों हंसते, लड़ते, एक-दूसरे को मनाते… और कब दोस्ती प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला।

एक दिन राहुल ने हिम्मत करके कहा— “प्रिया… मुझे लगता है मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ।”

कुछ पल की खामोशी के बाद प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा— “मुझे भी…”

उस दिन के बाद उनकी दुनिया और भी खूबसूरत हो गई।

लेकिन हर कहानी इतनी आसान नहीं होती…

एक दिन प्रिया बहुत चुप थी। ना कॉल, ना मैसेज। राहुल बेचैन हो गया। अगले दिन जब वो ट्रेन में मिली, उसकी आंखें नम थीं।

“क्या हुआ?” राहुल ने पूछा।

प्रिया ने धीरे से कहा— “घर वालों ने मेरी शादी तय कर दी है…”

राहुल के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“तुम मना कर दो… हमारे बारे में बताओ…” उसने कहा।

प्रिया ने सिर झुका लिया— “मैं कोशिश कर चुकी हूँ… लेकिन मैं अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सकती।”

उस दिन के बाद सब बदल गया। बातें कम हो गईं… मुलाकातें भी।

आखिरी दिन आया।

स्टेशन पर दोनों खड़े थे। भीड़ थी, आवाजें थीं… लेकिन उनके बीच सन्नाटा था।

राहुल की आंखों में आंसू थे— “क्या ये आखिरी बार है?”

प्रिया ने कांपती आवाज में कहा— “शायद…”

कुछ सेकंड के लिए दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा। वो पल जैसे रुक सा गया।

“अगर किस्मत में हुआ, तो हम फिर मिलेंगे…” प्रिया ने कहा।

और फिर वो मुड़कर चली गई।

राहुल उसे जाते हुए देखता रह गया… जब तक वो भीड़ में खो नहीं गई।

आज कई साल बीत चुके हैं…

राहुल अभी भी उसी शहर में है। वो आज भी कभी-कभी उसी ट्रेन में सफर करता है।

हर बार उसकी नजर उसी सीट को ढूंढती है… जहां पहली बार उसने प्रिया को देखा था।

उसे पता है कि वो शायद कभी वापस नहीं आएगी…

लेकिन फिर भी… कहीं ना कहीं दिल में एक उम्मीद बाकी है।

क्योंकि कुछ मोहब्बतें अधूरी होकर भी पूरी लगती हैं।

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